उत्तरजीविता का पूर्वाग्रह और सफलता की सबसे महत्वपूर्ण सीख।

अक्सर कहा जाता है कि यदि आप सफल बनने की इच्छा रखते हैं तो आपको सफलता पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। लेकिन कभी कभी जब विफलता अदृश्य हो जाती है, तो सफलता और विफलता के बीच का अंतर भी अदृश्य हो जाता है।

सुनने में थोड़ा अजीब लगता है, है ना? लेकिन यह सौ प्रतिशत सच है।

मैं आपको एक कहानी स्वरूप उदाहरण के साथ इसे समझाना चाहूँगा। लेकिन इससे पहले की मैं कहानी शुरू करूँ आपसे एक नम्र निवेदन करना चाहता हूं कि कृपया अपनी कुर्सी की पेटी बांध लीजिए। क्योंकि आज की कहानी में कुछ लड़ाकू विमान है जो क्रेश हो रहे है, कुछ समस्याएं है जो कि अनसुलझी है और एक गणितशास्त्री है जिसकी सोच थोड़ी टेढ़ी है।

कुल-मिलाकर कहूँ तो आज की कहानी इतनी अफलातून है कि शायद यह आपके दिमाग की बत्ती जला दे; अगर आपके पास एक है तो।

उत्तरजीविता का पूर्वाग्रह और सफलता की सबसे महत्वपूर्ण सीख।

दरअसल, बात विश्वयुद्ध की है, जब जापानी नौसेना द्वारा 8 दिसम्बर 1941 को संयुक्त राज्य अमेरिका के नौसैनिक बेस पर्ल हार्बर पर अचानक आक्रमण किया गया। जिसके परिणामस्वरूप यूएसए भी द्वितीय विश्व-युद्ध में कूद पड़ा। इस घटना के चार दिन बाद जर्मनी ने अपने मित्र राष्ट्र का समर्थन करते हुए अमेरिका पर युद्ध घोषित किया।

साल भर बीत चुका था, लेकिन अमेरिका अभी भी जर्मनी के खिलाफ लड़ रहा था। प्रतिदिन उनके लड़ाकू विमान जर्मन सेना की छावनियों के उपर से गुजरते, और प्राणघाती बमों की बारिश करतें। प्रत्युत्तर में जर्मन सेना उन लड़ाकू विमानों पर जोरों से हमला करके उन्हें ध्वस्त करने का प्रयास करती।

जिसके परिणामस्वरूप अमेरिकन वायु सेना के बहुत से विमान हमले के दौरान क्षतिग्रस्त होकर क्रेश हो रहे थे। इसलिए अपने सैनिकों को बचाने के लिए उन्होंने प्रयास शुरू कर दिए।

बात बिल्कुल साफ थी, उन्हें विमानों को और ज्यादा मजबूत और सुरक्षित बनाना पड़ेगा, ताकि विमान दुश्मनों की गोलीबारी को झेल सकें। लेकिन एक समस्या थी, वे चाहते हुए भी विमानों के हर हिस्से में कवच नही जोड़ सकते थे। क्योंकि अगर वे ऐसा करते तो विमान बहुत भारी हो जाते। और उड़ान भरने में दिक्कतें आती।

इसलिए उन्होंने एक तरकीब सोची, क्यों न विमान के सिर्फ उन हिस्सों पर कवच लगाया जाए जो बाकी हिस्सों की तुलना में अधिक कमजोर है, और जिनके क्षतिग्रस्त होने से सबसे ज्यादा विमान क्रेश हो रहे थे।

उन्होंने तत्काल दुश्मन के इलाके से क्षतिग्रस्त होकर लौटे विमानों की छान-बीन करके कुछ महत्वपूर्ण डाटा एकत्रित किया। जिसमें विमान पर गोलियों के छेद की संख्या और स्थान शामिल थे।

जिसे देखने पर बिल्कुल साफ पता चलता था कि विमान के छोरों पर और कुछ अन्य जगहों पर सबसे अधिक गोलियों के निशान पाए गए थे और उसी जगह विमान सबसे ज्यादा घायल भी हुए थे। जबकि बीच वाले हिस्से में बहुत कम निशान थे।

तो बात बिल्कुल साफ थी, कि अगर वे उन कमजोर जगहों पर अधिक कवच लगा दें, तो हमले के दौरान विमान के घायल होकर क्रेश होने की संभावना कम हो जाएगी और सैनिकों के सुरक्षित वापिस आने की संभावना बढ़ जाएगी।

इसके लिए उन्होंने एस.आर.जी. से संपर्क किया। SRG यानी कि स्टेटिस्टिकल रिसर्च ग्रुप। एक ऐसी संस्था थी जिसमें प्रतिभाशाली वैज्ञानिकों, कुशाग्र गणितज्ञों एवं दूसरे अन्य बुद्धिजीवी साथ मिलकर अमेरिकन आर्मी को युद्ध जिताने में मदद कर रहे थे।

तो वायुसेना ने SRG से निवेदन किया कि वे जांच करके बताए कि उन्हें इष्टतम परिणाम प्राप्त करने के उन कमजोर हिस्सों पर कितना कवच लगाना चाहिए?

SRG के सदस्यों ने इस काम को अब्राहम वाल्ड को सौंप दिया। अब्राहम वाल्ड एक हंगेरियन नागरिक थे। उन्होंने वियना से गणित में पीएचडी हासिल की थी। 1938 में जब नाजियों ने हंगरी पर कब्ज़ा किया, तो यहूदियों के खिलाफ भेदभाव ने गंभीर रुप ले लिया। वाल्ड और उनके परिवार को यहूदियों होने की वजह से सताया जाने लगा। उसी समय उन्हें काउल्स कमीशन फॉर रिसर्च इन इकोनॉमिक्स की तरफ से अर्थमिति अनुसंधान पर काम करने की नौकरी मिल गई और वे यू.एस.ए आकर बस गए।

तो अब्राहम वाल्ड ने सर्वप्रथम वायुसेना द्वारा भेजे गए डाटा का अध्ययन किया। और फिर उन्होंने सैन्य कमांडर को सुझाव देते हुए कहा कि- “आपको विमान के उन हिस्सों पर कवच लगाना चाहिए जहां गोलियों के निशान बहुत कम है। बजाय उन हिस्सों पर जहां गोलियों के निशान सबसे ज्यादा हैं।”

कमांडर ने चौकते हुए उसका कारण पूछा।

वाल्ड ने उनको समझाते हुए कहा- “बात बिल्कुल साफ है श्रीमान, विमान के जिन स्थानों में सबसे ज्यादा गोलियां लगी है उससे यह मालूम होता है कि वे सभी स्थान गोलियों को बर्दाश्त करने में सक्षम है। लेकिन जिन जगहों पर गोलियों के निशान सबसे कम है, शायद वे ऐसे स्थान है जहां पर गोलियां लगने की वजह से विमान क्रेश हो रहे है।”

अमेरिकन वायु सेना ने समस्या की जांच के वक़्त एक बहुत बड़ी गलती की थी। उन्होंने सिर्फ उन विमानों की छान भीन की जो हमला करके ने बाद क्षतिग्रस्त होकर वापिस लौटे। वे भूल रहे थे कि उनके डाटा में उन विमानों को शामिल नहीं किया गया था जो खो गए थे।

वायु सेना ने उनकी सलाह का अमल किया और परिणाम आश्चर्यजनक निकलें। विमान में नए बदलाव करने के तुरंत बाद, अधिक विमान सुरक्षित रुप से वापिस आना शुरू हो गए और अनगिनत पायलटों और सैनिकों की व्यर्थ कुर्बानी कम होने लगी।

इस तरह वाल्ड ने वायु सेना मंत्रालय को उत्तरजीविता के पूर्वाग्रह में गिरने से बचाया। और तो और वाल्ड का तर्क न केवल दूसरे विश्व युद्ध में, बल्कि कोरिया और वियतनाम की लड़ाई में भी सैनिकों की जान बचाने के लिए काम आया।

इसी को कहते है उत्तरजीविता का पूर्वाग्रह यानी कि survivorship bias. जिसका सार यह है कि हम अक्सर विफलताओं को नहीं देखते हैं। युद्ध में, व्यापार में और जीवन में भी। और कभी-कभी यह असफलताएं होती हैं जिनमें सबसे महत्वपूर्ण सबक होते हैं।

कैसे बना मैं उत्तरजीविता के पूर्वाग्रह का शिकार?

तकरीबन दो साल पहले की बात है, मेरा वजन 48 किलो था, और दिखने में मैं बहुत कुछ साउथ इंडियन फ़िल्म ‘मारी’ के हीरो धनुष जैसा लगता था; लेकिन थोड़ा सा गोरा।

एक दिन मैंने आईने में अपने आप को देखा, और एक पल के लिए मेरे मन में ख्वाहिश हुई कि काश मेरी भी बॉडी बॉलीवुड के हीरों जैसी डोले-शोले वाली होती।

बस वही से शुरू हुई कहानी मेरी और बॉडी बिल्डिंग की,

मैंने इंटरनेट पर बॉडी बिल्डिंग के बारे में आर्टिकल्स पढ़ना शुरू किए, यूट्यूब पे वीडियो देखने लगा। अलग अलग मसल्स के बारे में पढ़ने लगा। बाइसेप्स, ट्राइसेप्स, डेल्टोइड और लाटिस्सिमुस डोरसी के बारे में पढ़ा।

मैंने ऐसे लोगों के बारे में पढ़ा जिन्होंने मेरे जैसी दुबली काया को कठिन परिश्रम करके अर्नाल्ड श्वार्जनेगर की मिनी कॉपी बना लिया था। और उनके बताए गए रास्ते पर चलना शुरू कर दिया।

मैंने एक नज़दीकी जिम में तीन महिने की मेम्बरशिप ली। और हर रोज़ सुबह जल्दी उठकर जिम जाने लगा, व्यायाम करके पसीना बहाने लगा और तो और प्रोटीन वाला पाउडर भी पीने लगा। और तकरीबन सात से दस दिन के अंदर ही मेरा पूरा शरीर कठिन परिश्रम करने की वजह से Delayed Onset Muscle के दर्द से कराहने लगा।

उसके बाद एक शनिवार की सुहानी शाम आ गई और रात को सोने से पहले मुझे अचानक किसी फिटनेस ब्लॉग पर पढ़ी सलाह याद आ गई। जिसमें लिखा था कि शरीर को हफ़्ते में कम से कम एक दिन रेस्ट देना बहुत जरूरी है और लगभग सभी कामयाब बॉडी बिल्डर भी इस बात का समर्थन करते है।

मेरे मन में ख्याल आया, “अरे यार, पूरा बॉडी दर्द कर रहा है, वैसे भी कल अगर जिम जाऊंगा, तो भी ढाई किलो का डंबल तक तो उठा नही पाऊंगा। इससे तो अच्छा है एक दिन आराम ही कर लूं।”

उसके बाद सोमवार की सुबह अलार्म बजने पर मेरी नींद खुली, लेकिन मैंने महसूस किया कि बॉडी अभी भी दर्द कर रही है। मैंने अपनी अंतरआत्मा से एक और दिन की छुट्टी का आवेदन किया जो मुझे आसानी से मिल गई। फिर मैंने अपना अलार्म बंद किया और बड़ी मासूमियत के साथ वापिस रजाई ओढ़ कर सो गया।

और बस कहानी खत्म। मैं आज भी जब आईने में अपने शरीर को देखता हूं तो वही भावना मेरे दिल में पैदा होती है कि “काश मेरी भी बॉडी बॉलीवुड के हीरों जैसी डोले-शोले वाली होती।” लेकिन मैने आज तक दोबारा कभी जिम जाने का प्रयास नही किया हैं।

अनगिनत आर्टिकल्स और वीडिओज़ पढ़ने और देखने के बाद भी मैं बॉडी बनाने में असफल रहा, पता है क्यों? क्योंकि जिम जॉइन करने से पहले मैंने एक बार भी उन लोगों के बारे में जानने की कोशिश नही की थीं, जिन्होंने मेरी तरह बॉडी बनाने की कोशिश तो की, लेकिन असफल रहे।

मैंने यह जानने की कोशिश तो की कि लोग बॉडी कैसे बनाते है। लेकिन कभी यह जानने का प्रयास नही किया कि लोग बॉडी क्यों नही बना पाते। अगर मैंने एकबार भी जांच की होती तो मुझे पता होता कि 60 प्रतिशत लोग जिम जॉइन करने के 15 दिन के अंदर ही जिम जाना बंद कर देते है। मुझे पता होता कि बॉडी बनाने के लिए मुझे प्रोटीन पावडर पीने की जरूरत नही थी, न ही कठिन परिश्रम करने की जरूरत थी।

मुझे जरूरत थी तो हर रोज़ जिम जाने की आदत डालने की, प्रतिदिन व्यायाम करने की आदत डालने की। कठिन परिश्रम और प्रोटीन पावडर की जरूरत तो बहुत समय बाद पड़ती है।

अगर मैंने लापता कारणों पर अपना ध्यान केंद्रित किया होता तो मैं प्रतिदिन जिम जाने की आदत बनाता; और व्यायाम करने की भी। जिसके फलस्वरूप मैं एक न एक दिन अपनी मनचाही बॉडी बना ही लेता।

परंतु इस संसार में केवल मैं अकेला इंसान नही हूं जो उत्तरजीविता के पूर्वाग्रह का शिकार बना। अक्सर हम सब सफल लोगों की कहानियों पर गौर करते है और यह समझने का प्रयास करते है कि वे कौन से कार्य थे जिन्हें करके वे लोग सफल हुए, फिर उन्ही चीजों को हमारे जीवन में दोहराने की कोशिश करते है।

लेकिन हम कभी यह जानने की कोशिश नही करते कि वे कौन से कारण है जिसकी वजह से लोग असफल होते है। और हम इस सच्चाई को जान ही नही पाते कि जिन कारणों को हम असफलता का प्रतीक मानते थे वें असल में सफलता का प्रतिनिधित्व कर रहे है।

तो आज की कहानी का सबक यह है कि “अगर आप किसी चीज में सफल बनना चाहते है तो यह सीखें कि दूसरे लोग कैसे सफल हुए। और बेशक उसे अपने जीवन में उनके नियमों को अपनाने की कोशिश करें। लेकिन साथ में उन लापता कारणों को मत भूलिए जिसकी वजह से बहुत से लोग असफल हो जाते हैं।”

एक बार जब आप इस पूर्वाग्रह को समझ लेते है तो यह आपको हर जगह दिखाई देने लगता हैं। सफलता की यह सीख आपको गलत और अधूरी जानकारी के आधार पर बुरे निर्णय लेने से बचा सकती है।

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