अब्दुल कलाम स्पीच इन हिंदी

अब्दुल कलाम और नेतृत्व का सबक। Abdul Kalam Speech In Hindi

अब्दुल कलाम और नेतृत्व का सबक।

स्वतंत्र भारत के इतिहास के सबसे लोकप्रिय राष्ट्रपति ए. पी. जे. अब्दुल कलाम भारत के सबसे प्रसिद्ध वैज्ञानिकों में से एक थे। उन्होंने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के लिए काम किया जहां उन्होंने पृथ्वी की कक्षा में भारत के पहले उपग्रहों को लॉन्च करने में मदद की।

बाद में, कलाम ने मिसाइलों और अन्य स्वदेशी लड़ाकू हथियार विकसित करने पर काम किया। 1998 में भारत के परमाणु हथियारों के सफल परीक्षण के बाद कलाम जी पूरे देश के राष्ट्रीय हीरो बन गए। और 2002 में कलाम जी को देश के राष्ट्रपति के लिए चुना गया और उन्होंने 2007 तक यह पद संभाला था।

फिलाडेल्फिया में व्हार्टन इंडिया इकोनॉमिक फोरम के दौरान कलाम ने Knowledge@Wharton के साथ बात की थी।

इंटरव्यू के दौरान ए. पी. जे. अब्दुल कलाम को एक सवाल पूछा गया कि क्या आप अपने जीवन से जुड़े ऐसे कोई अनुभव के बारे में बता सकते है जो हमें यह सिखाए कि एक नेता को विफलता को किस तरह मैनेज करना चाहिए?

जिसके जवाब में माननीय कलाम जी ने अपने जिंदगी से जुड़े एक बेहद प्रेरक प्रसंग के बारे में बताया जो मैं आज आपके साथ शेयर करना चाहूंगा।

Abdul Kalam Speech In Hindi

मैं आपको अपने एक अनुभव के बारे में बताना चाहूंगा। 1973 में मुझे भारत के सेटेलाइट लॉन्च व्हीकल प्रोग्राम (उपग्रह प्रक्षेपण वाहन कार्यक्रम) का प्रोजेक्ट डायरेक्टर बनाया गया, जिसे आमतौर पर SLV -3 कहा जाता है। हमारा लक्ष्य 1980 तक भारत के “रोहिणी” उपग्रह को पृथ्वी की कक्षा में रखना था।

इसके लिए मुझे धन और मानव संसाधन दोनों दिए गए थे। लेकिन साथ ही में मुझे स्पष्ट रूप से बताया गया था कि 1980 तक हमें उपग्रह को अंतरिक्ष में लॉन्च करना ही पड़ेगा।

लक्ष्य को पूरा करने के लिए वैज्ञानिकों और तकनीकों की टीमों में हजारों लोग एक साथ काम करके अगस्त 1979 में हमने अपनी तैयारी पूरी कर ली, और एस.एल.वी.-3 का पहला प्रायोगिक उड़ान परीक्षण हमने 10 अगस्त, 1979 को तय किया।

परीक्षण के दिन मैं कंट्रोल सेंटर में खड़ा था। और प्रोजेक्ट डायरेक्टर होने की वजह से लॉन्च का नियंत्रण मेरे हाथ में था। उपग्रह लॉन्च से चार मिनट पहले, कंप्यूटर ने चेक-लिस्ट के मुताबिक उन वस्तुओं की जांच शुरू की जिन्हें जाँचने की आवश्यकता थी।

एक मिनट बाद, कंप्यूटर प्रोग्राम ने लॉन्च को होल्ड पर रख दिया; डिस्प्ले दिखा रही थी कि कुछ नियंत्रण घटक क्रम में नहीं थे। पास खड़े मेरे विशेषज्ञों मुझे चिंता न करने के लिए कहा; उन्होंने अपनी गणना पहले से की हुई थी और रॉकेट में पर्याप्त आरक्षित ईंधन भी था।

तो मैंने कंप्यूटर को बाइपास करके, मैन्युअल मोड में स्विच कर दिया, और तेईस मीटर लंबा और चार चरणोंवाला यह रॉकेट सत्रह टन का वजन ले कर सात बजकर अठावन मिनट पर आसमान की तरफ रवाना हुआ।

प्रक्षेपण के फौरन बाद ही इसकी प्रणालियों ने अपने काम शुरू कर दिए। पहले चरण ने पूर्ण सफलता से अपना काम किया। इस चरण को दूसरे चरण में परिवर्तित होना था। हम एस.एल.वी.-3 को उड़ता हुआ देखने की उम्मीदें लिये हुए थे। लेकिन अचानक ही एक गड़बड़ी आ गई और उम्मीदों को धक्का लगा।

रॉकेट का दूसरा चरण नियंत्रण से बाहर हो गया। 317 सेकंड के बाद ही उड़ान बंद हो गई और मेरे चौथे चरण सहित पूरा यान श्रीहरिकोटा से पाँच सौ साठ किलोमीटर दूर समुद्र में जा गिरा।

यह एक बड़ी विफलता थी। उस दिन, इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन(इसरो) के अध्यक्ष प्रोफेसर सतीश धवन ने एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस बुलाया, जहां दुनिया भर के पत्रकार मौजूद थे।

और खुद प्रेस कॉन्फ़्रेंस का नेतृत्व संभाला और असफलता की ज़िम्मेदारी लेते हुए प्रेस से कहा कि टीम के लोगों ने बहुत मेहनत की है, लेकिन उन्हें थोड़ी और तकनीकी सहायता की आवश्यकता है।

उन्होंने मीडिया को आश्वासन दिया कि एक और वर्ष में, टीम निश्चित रूप से सफल होगी। अब, चूंकि मैं प्रोजेक्ट डायरेक्टर था, इसलिए यह मेरी विफलता थी, लेकिन इसके बजाय, उन्होंने संगठन के अध्यक्ष के रूप में विफलता की ज़िम्मेदारी ली।

अगले वर्ष, जुलाई 1980 में, हमने उपग्रह लॉन्च करने के लिए फिर कोशिश की, और इस बार हम सफल हुए। पूरे देश में उत्साह की लहर फैल गई।

और एक बार फिर से एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस को आयोजित किया गया, प्रोफेसर धवन ने मुझे एक तरफ बुलाया और कहा, “कलाम, आज प्रेस कॉन्फ़्रेंस का नेतृत्व तुम्हें करना है।”

उस दिन मैंने एक बहुत ही महत्वपूर्ण सबक सीखा। जब टीम असफल होती है, तब संगठन का नेता असफलता की जिम्मेदारी अपने सर पर लेता है। लेकिन और जब टीम सफल होती है, तब वह सफलता का श्रेय अपनी टीम को देता है।

मैनेजमेंट का सबसे अच्छा सबक जो मैंने सीखा, वह मुझे किसी किताब को पढ़ने से नही मिला, बल्कि एक वास्तविक अनुभव से मिला।

Abdul Kalam Speech at European Parliament

2007 में, जब ए. पी.जे. अब्दुल कलाम भारत के राष्ट्रपति थे, तब उन्होंने यूरोपीय संघ की स्वर्णिम जयंती के दौरान फ्रांस के स्ट्रैसबर्ग में यूरोपीय संसद को संबोधित किया था। यह स्पीच कलाम जी द्वारा दि गई सबसे यादगार स्पीच में से एक है, जो हम सभी को मानवता महत्वपूर्ण सबक सिखाती है।

आज मैं उनकी स्पीच से एक उल्लेखनीय अंश शेयर करना चाहूंगा।
जहां दिल में धार्मिकता होती है,
वहां चरित्र में सुंदरता होती है।

जब चरित्र में सुंदरता होती है,
तब घर में एकता होती है।

जब घर में एकता होती है,
तब देश में अनुशासन होता है।

जब देश में अनुशासन होता है,
तब दुनिया में शांति होती है।

माननीय सदस्यों, यह पूरी दुनिया के लिए सच है। जब हमें दुनिया में शांति की आवश्यकता होती है, तो हमें देश में अनुशासन की आवश्यकता रहती है। हमें घर में सद्भाव की ज़रूरत है। चाहे यूरोप, भारत या दुनिया का कोई भी हिस्सा क्यों न हो, लेकिन शुरुआत तो दिल में धार्मिकता होने से ही हो सकती है।

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